राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में अंतर | Difference between National Population Register and National Citizenship Register

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में अंतर | Difference between National Population Register and National Citizenship Register 

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर के लिए जानकारियां जुटाने के तरीके में केंद्र सरकार में कुछ बदलाव किए हैं। अब एनपीआर में बायोमैट्रिक जानकारियां नहीं मांगी जाएंगी और न ही किसी प्रकार का कोई दस्तावेज लिया जाएगा।

Difference between National Population Register and National Citizenship Register
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में अंतर

24 दिसंबर को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यह फैसला लिया गया कि देश में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर (National Population Register- NPR) को आगे बढ़ाया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है, जब देशभर में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी (NRC) का विरोध किया जा रहा है। हालांकि सरकार ने अब तक एनआरसी को असम से बाहर किसी अन्य राज्य में लागू नहीं किया है।
राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर के लिए जानकारियां जुटाने के तरीके में केंद्र सरकार में कुछ बदलाव किए हैं। अब एनपीआर में बायोमैट्रिक जानकारियां नहीं मांगी जाएंगी और न ही किसी प्रकार का कोई दस्तावेज लिया जाएगा। इसे पूरी तरह से स्वघोषित रखा जाएगा। इसके लिए सरकार ने 3,941.35 करोड़ रुपये का बजट भी जारी किया है। 
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने समाचार एजेंसी एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस (एनआरसी) और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) में कोई संबंध नहीं है.
पश्चिम बंगाल और केरल के मुख्यमंत्रियों ने पहले ही अपने राज्य में एनपीआर लागू नहीं करने की बात कही है. इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने कहा है कि एनपीआर, एनआरसी का ही दूसरा रूप है.
इस पर स्पष्टीकरण देते हुए अमित शाह ने कहा कि एनपीआर में आम आदमी जो सूचना देंगे, उसके आधार पर जानकारियां एकत्रित की जाएंगी, कोई दस्तावेज़ नहीं मांगा जाएगा. हालांकि एनपीआर और जनगणना दोनों की व्यवस्थाएं अलग अलग क्यों होगी, इस बारे में अमित शाह स्पष्ट अंतर नहीं बता सके, उन्होंने कहा है कि दोनों अलग अलग व्यवस्थाएं हैं.


असदुद्दीन ओवैसी पर अमित शाह ने ये भी कहा है कि अगर वे कहेंगे कि सूरज पूर्व में उगता तो ओवैसी जी कहेंगे कि नहीं सूर्य तो पश्चिम में उगता है, उन्होंने हमेशा हमारा विरोध किया है. लेकिन फिर भी मैं उन्हें भरोसा दिलाता हूं कि नागरिकता संसोधन क़ानून का एनआरसी से कोई लेना देना नहीं है.
हालांकि इसके बाद असदुद्दीन ओवैसी ने भारतीय गृह मंत्रालय की पीआईबी प्रेस रिलीज़ को ट्वीट किया है, जिसमें कहा गया है एनपीआर, एनआरसी तैयार करने की दिशा में पहला क़दम है.
तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओब्रायन ने भी यही रिलीज जारी करके कहा कि संसद में यह गृह राज्य मंत्री का बयान था.
उल्लेखनीय है कि यह जवाब 24 नवंबर, 2014 को किरण रिजिजू ने राज्य सभा में यह जवाब दिया था.
वैसे अमित शाह ने अपने इंटरव्यू में ये भी कहा है कि अभी पूरे भारत में एनआरसी को लागू करने की बात नहीं है. उन्होंने ये कहा, "अभी पूरे भारत में एनआरसी को लागू करने की बात नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी सही कह रहे थे. अभी इस पर कैबिनेट और संसद में इस पर चर्चा नहीं है."
अमित शाह ने नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) पर कहा है कि इस पर लोगों को भड़काया जा रहा है, जबकि यह क़ानून लोगों को नागरिकता देने के लिए है, किसी की नागरिकता लेने के लिए नहीं है.

अमित शाह Ji ने कहा, "पिछली सरकार में भी ऐसी ही टाइमलाइन थी. एनपीआर कांग्रेस के शासन में आया था. एनपीआर से किसी की नागरिकता जानने वाली नहीं है."

डिटेंशन सेंटर पर अमित शाह

"डिटेंशन सेंटर एक सतत प्रक्रिया है. डिटेंशन सेंटर में अवैध प्रवासियों को रखा जाता है. उन्हें जेल में नहीं रख सकते. उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखा जाता है और बाद में उन्हें डिपोर्ट करने या उनके देश वापस भेजने की प्रक्रिया होती है. असम में जो 19 लाख लोग एनआरसी से बाहर हैं, वो डिटेंशन सेंटर में नहीं हैं, वो अपने ही घरों में रह रहे हैं."
"डिटेंशन सेंटर मेरे हिसाब से एक ही है और असम में है. ये व्यवस्था कई सालों से है, ये एनआरसी के लिए नहीं बनाया गया है. अवैध रूप से भारत में रह रहे लोगों को वहां रखा जाता है."
इससे पहले केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने एनपीआर पर क्या कहा-
  • नरेंद्र मोदी कैबिनेट ने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को मंज़ूरी दी
  • कैबिनेट ने एनपीआर के लिए 3941 करोड़ रुपये मंज़ूर किए
  • एनपीआर में कुछ नया नहीं, पहले से चली आ रही
  • एनपीआर और एनआरसी में कोई संबंध नहीं
  • कैबिनेट में एनआरसी पर कोई चर्चा नहीं हुई.
एनआरसी और एनपीआर पर मचे बवाल के बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर को अपडेट करने की मंज़ूरी दे दी.
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने मंत्रिमंडल के फ़ैसले की जानकारी देते हुए कहा कि एनपीआर हर दस साल पर अपडेट होता है. उन्होंने कहा, "पहली बार इसे साल 2010 में यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने अपडेट किया था, अब इसे दस साल बाद हम अपडेट कर रहे हैं. यानी साल 2020 में. हम कुछ भी नया नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि एनपीआर के लिए किसी तरह के कागजात या सबूत नहीं ज़रूरत नहीं है. उन्होंने कहा, "कोई दस्तावेज नहीं मांग रहे हैं. बायोमैट्रिक भी नहीं मांगा जा रहा है. स्वसत्यापन माना जाएगा. हमें अपनी जनता पर पूरा यकीन है. जो जनता कहे वही सही है."
उन्होंने कहा कि एनपीआर में जनगणना का काम ऐप के ज़रिये किया जाएगा. अगले साल अप्रैल से इस पर काम होगा 
जावडेकर ने कहा कि नागरिकता और एनपीआर को लेकर भ्रम नहीं होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि देश के सामान्य निवासियों की व्यापक पहचान का डेटाबेस बनाना इसका मुख्य लक्ष्य है. इस डेटा में जनसांख्यिंकी के साथ बायोमेट्रिक जानकारी भी होगी. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में 2010 में एनपीआर बनाने की पहल शुरू हुई थी. तब 2011 में जनगणना के पहले इस पर काम शुरू हुआ था. अब फिर 2021 में जनगणना होनी है. ऐसे में एनपीआर पर भी काम शुरू हो रहा है.
अगले साल अप्रैल से अपडेशन का काम शुरू होगा और सितंबर तक चलेगा.

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में अंतर | Difference between National Population Register and National Citizenship Register

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर में अंतर | Difference between National Population Register and National Citizenship Register
Difference between National Population Register and National Citizenship Register

पहले नागरिकता कानून, फिर एनआरसी और अब एनपीआर। Kvs24News आपको नागरिकता कानून और एनआरसी में फर्क बता चुका है। आइए आज आपको राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर और एनआरसी के बीच फर्क बताते हैं:

एनपीआर और एनआरसी में फर्क क्या है?

  • एनआरसी (NRC) असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की सूची है जिसे असम समझौते को लागू करने के लिये तैयार किया गया है।
  • इसमें केवल उन भारतीयों के नाम को शामिल किया गया है जो 25 मार्च, 1971 के पहले से असम में रह रहे हैं।
  • उसके बाद असम आने वालों को बांग्लादेश वापस भेजा जा सकता है।
  • एनआरसी के विपरीत, एनपीआर (NPR) नागरिकता गणना अभियान नहीं है।
  • इसमें छह महीने से अधिक समय तक भारत में रहने वाले किसी विदेशी को भी इस रजिस्टर में दर्ज किया जाएगा।
  • एनपीआर के तहत असम को छोड़कर देश के अन्य सभी क्षेत्रों के लोगों से संबंधित सूचनाओं का संग्रह किया जाएगा।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर


एनपीआर ‘देश के सामान्य निवासियों’ की एक सूची है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, ‘देश का सामान्य निवासी’ वह है जो कम-से-कम पिछले छह महीनों से स्थानीय क्षेत्र में रहता हो या अगले छह महीनों के लिये किसी विशेष स्थान पर रहने का इरादा रखता है। देश में लोगों की संख्या का रजिस्टर, जो गांव, कस्बे, तहसील, जिला, राज्य, राष्ट्रीय स्तर पर तैयार हाेता है। 2010 में यूपीए शासन ने इसे लागू किया था। इसे अपडेट करना कानूनी बाध्यता है।

एनपीआर की आवश्यकता क्या है ?

सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन और भविष्य के हिसाब से याेजनाओं का आकार और अन्य फैसलाें के लिए यह जानकारी आधार बनेगी।

एनपीआर कब और कहां लागू हाेगा?


असम काे छाेड़कर सभी राज्याें में 2020 में अप्रैल से सितंबर तक तैयार हाेगा। जनगणना के पहले चरण में घराें की लिस्टिंग के दाैरान यह काम हाेगा।

क्या पूछा जाएगा? क्या-क्या दस्तावेज लगेंगे?




  • नाम
  • घर के मुखिया से संबंध
  • माता-पिता का नाम
  • वैवाहिक स्थिति
  • जीवनसाथी का नाम
  • लिंग
  • जन्मतिथि
  • जन्म स्थान
  • राष्ट्रीयता
  • पता
  • पेशा
  • शैक्षणिक याेग्यता
जैसा ब्याेरा पूछा जाएगा। काेई दस्तावेज जरूरी नहीं है। सेल्फ डिक्लेरेशन होगा।

एनपीआर का विचार कहां से आया ?

एनपीआर का विचार यूपीए शासनकाल के समय वर्ष 2009 में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम द्वारा लाया गया था। लेकिन उस समय नागरिकों को सरकारी लाभों के हस्तांतरण के लिए सबसे उपयुक्त आधार प्रोजेक्ट का इससे टकराव हो रहा था। एनपीआर के लिए डाटा को पहली बार वर्ष 2010 में जनगणना-2011 के पहले चरण, जिसे हाउस लिस्टिंग चरण कहा जाता है के साथ एकत्र किया गया था। वर्ष 2015 में इस डाटा को एक हर घर का सर्वेक्षण आयोजित करके अपडेट किया गया था।
प्रत्येक देश में प्रासंगिक जनसांख्यिकीय विवरण के साथ अपने निवासियों का व्यापक पहचान डाटाबेस होना चाहिए। यह सरकार को बेहतर नीतियां बनाने और राष्ट्रीय सुरक्षा में भी मदद करता है। लगभग सभी विकसित देशों में ऐसा किया जाता है।

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में अंतिम निवास स्थान, पासपोर्ट नंबर, पैन, ड्राइविंग लाइसेंस नंबर, वोटर आईडी कार्ड और मोबाइल नंबर को भी अद्यतन आंकड़ों के रूप में शामिल किया जा सकता है। इन आंकड़ों को वर्ष 2010 के राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में शामिल नहीं किया गया था।



मनमोहन सरकार ने की थी शुरुआत




यूपीए सरकार ने साल 2010 में NPR बनाने की पहल शुरू की थी। इसके बाद साल 2011 में हुई जनगणना के पहले इस पर काम शुरू किया गया था। बता दें कि साल 2021 में फिर देश की जनगणना होनी है, ऐसे में NPR पर एक बार फिर काम शुरू हो सकता है।

NPR और NRC में यह है बड़ा अंतर -

नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर और एनआरसी में बहुत बड़ा अंतर है। एनआरसी के पीछे जहां देश में अवैध तौर पर रहने वाले लोगों की पहचान करना है, वहीं एनपीआर में छह महीने या उससे ज्यादा वक्त तक किसी एक जगह पर रहने वाले व्यक्ति को राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है।

कोई व्यक्ति अगर बाहरी है और वह देश के किसी हिस्से में 6 महीने से ज्यादा वक्त से रह रहा है तो उसे भी NPR में नाम दर्ज कराना अनिवार्य है। NPR का मुख्य मकसद बायोमैट्रिक डेटा तैयार कर असली लाभार्थियों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना है।
































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